अनन्यता · अहंकार · नाम जप · भक्ति के पाँच भाव · कर्म सिद्धांत
Premanand Ji Maharaj Pravachan में इस बार कुछ ऐसे प्रश्न उठे जो हर साधक के मन में होते हैं — अनन्यता और कट्टरता में क्या अंतर है? भक्ति और प्रेम एक ही है या अलग? अहंकार से कैसे बचें? मन को कैसे काबू करें?
महाराज जी ने इन सब प्रश्नों का उत्तर जिस गहराई और करुणा से दिया — वो सुनने में सरल था, लेकिन भीतर तक उतर जाने वाला था। यही सार यहाँ आपके सामने है।
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Ananyata vs Kattarta — Premanand Ji Maharaj ke Anusar Asli Bhakti ka Raaz

घनश्याम जी ने पूछा — “शरणागति के लिए उच्चतम कोटि की अनन्यता आवश्यक बताई जाती है, लेकिन मुझे अनन्यता और कट्टरता के भेद को समझना है।”
महाराज जी का पहला वाक्य ही हृदय में उतर गया:
“कट्टरता नीरस है, अनन्यता सरस है। कट्टरता की निरसता क्रोध लाएगी — और अनन्यता की सरसता दया लाएगी।”— प्रेमानंद जी महाराज (मूल प्रवचन)
अनन्यता क्या होती है?
जो साधक सच में अपने इष्ट का अनन्य भक्त होता है — वो संसार के हर प्राणी में उसी इष्ट का स्वरूप देखता है। जो उसकी निंदा करे, उसके प्रति भी उसके मन में यही भाव उठता है:
“भगवान तुम्हारा मंगल करें। भगवान तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान करें। ये जो कुबुद्धि आई है — भगवान कृपा करके इसका त्याग करवा दें।”
यही अनन्यता है। क्रोध नहीं — करुणा। बैर नहीं — मंगल कामना। अनन्यता में सबका सम्मान होता है, निंदा करने वाले के प्रति भी प्रेम होता है।
कट्टरता क्या होती है?
जो अपने धर्म को, अपनी उपासना को, अपने आप को श्रेष्ठ मानकर दूसरे वैष्णव को देखकर जलता है — दूसरे की निंदा करता है — दूसरे की हानि और दुर्गति सोचता है — वो कट्टरता है। यह भक्ति का मुखौटा पहने अहंकार है।
| पहलू | ✅ अनन्यता | ❌ कट्टरता |
|---|---|---|
| स्वभाव | सरस, प्रेमपूर्ण | नीरस, कठोर |
| भाव | दया, करुणा | क्रोध, घृणा |
| दूसरों के प्रति | सम्मान, मंगल कामना | निंदा, ईर्ष्या |
| प्रतिक्रिया | क्षमा, शांति | बदले की भावना |
| पहचान | सब में इष्ट दिखना | केवल अपना श्रेष्ठ मानना |
| परिणाम | भगवत प्रेम बढ़ता है | अहंकार बढ़ता है |
महाराज जी का स्पष्ट संदेश:
“कट्टरवादी नहीं — अनन्य बनो। अपने इष्ट के अनन्य बनो।”
“जब मैं था तब हरि नहीं” — Premanand Ji Maharaj ke Anusar Iska Gehra Arth

दुष्यंत कुमार सिंह जी ने पूछा — “जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं — इस दोहे का आध्यात्मिक जीवन में क्या मतलब है?”
देहाभिमान — वो ‘मैं’ जो भगवान को रोकता है
महाराज जी ने समझाया — हमारे अंतःकरण में दो प्रकार का ‘मैं’ होता है:
देहाभिमान जनित ‘मैं’
मन सहित पाँच इंद्रियों को शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध में आसक्त करने वाला। इसी में सारे दोष रहते हैं। यही द्वैत का भ्रम फैलाता है।
स्वरूप का ‘मैं’
शुद्धमय, भगवदाकार, ब्रह्माकार। यह निर्दोष है। यही असली मैं है। साधना इसी तक पहुँचने की है।
अहंकार विमूढ़ आत्मा — मूल संकट
“अहंकार विमूढ़ आत्मा कर्ता वनते — जब तक ये मूढ़ता बनी रहती है, तब तक वो अपने को कर्ता और भोक्ता मानता है।”— गीता भाव, महाराज जी के शब्दों में
सबके हृदय में भगवान विराजमान हैं — यह सत्य है। लेकिन जब तक मनुष्य खुद को कर्ता और भोक्ता मानता रहता है — तब तक भगवान की उपस्थिति का अनुभव नहीं होता। सारी साधना इस ‘मैं’ को शुद्ध करने की है — भक्ति के द्वारा समर्पण, ज्ञान के द्वारा नाश।
जब यह देहाभिमान जनित ‘मैं’
गुरुदेव के चरणों की उपासना से भगवान में समर्पित हो जाता है —
तभी शुद्धमय ब्रह्म स्वरूप बचता है। तभी परमानंद का अनुभव होता है।
यही उस दोहे का सार है — “प्रेम गली साँकरी, ताहि दो न समाए।” अहंकार और भगवान एक साथ नहीं रह सकते। जब ‘मैं’ गया — तभी हरि आए।
भक्ति और प्रेम में क्या अंतर? Bhakti VS Prem

मधु जी ने पूछा — “क्या भक्ति में लगाव और प्रेम में फर्क होता है?” महाराज जी ने बहुत सूक्ष्म रूप से इसका उत्तर दिया।
भक्ति की प्रथम भूमिका — ‘मैं’ की उपस्थिति
जब हम कहते हैं — “मैं प्रभु का भजन कर रहा हूँ, मैं प्रभु की आराधना कर रहा हूँ” — तब यह भक्ति की प्रथम अवस्था है। यहाँ भक्त और भगवान दोनों अलग हैं। ‘मैं’ का भान बना है।
प्रेम की अंतिम अवस्था — ‘मैं’ का विस्मरण
प्रेम वो स्थिति है जब अपनी भी सुधि नहीं रहती। ‘मैं प्रभु की आराधना कर रहा हूँ’ — इसका भी विस्मरण हो जाता है। केवल आराधना होती रहती है। केवल प्रभु रह जाते हैं।
ब्रह्म नहीं, माया नहीं, जीव नहीं, काल —
अपनी हूँ सुधि ना रही, एक रहो नंदलाल।
— भक्त वाणी (महाराज जी उद्धृत)
गोपियों का प्रेम — पराकाष्ठा का जीवंत उदाहरण
गोपियाँ दही बेचने बाजार जाती थीं। बोलना चाहती थीं — “दही ले लो।” लेकिन मुँह से निकलता था — “गोविंद ले लो… माधव ले लो… दामोदर ले लो।”
“विक्रेतु काम — वो बोलना चाहती हैं दही ले लो, लेकिन निकलता है गोविंद ले लो। क्योंकि भगवान की रति को प्राप्त हो गई हैं।”— प्रेमानंद जी महाराज (मूल प्रवचन)
प्रेम में वाणी से लेकर समस्त इंद्रियाँ प्रीतम में डूबी होती हैं। प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान है — हर पल नया। इसमें कोई कामना नहीं रहती। यह अनुभव स्वरूप है।
भक्ति से प्रेम तक का सफर:
“मैं भजन कर रहा हूँ” → “केवल भजन हो रहा है” → “केवल भगवान हैं”
यही है Premanand Ji Maharaj Pravachan का केंद्रीय भाव।
भक्ति के 5 भाव — Gyan se Prem tak ka Safar

महाराज जी ने भक्ति के पाँच भावों का वर्णन करते हुए ज्ञान और प्रेम के बीच का गहरा दर्शन समझाया:
१. शांत भाव
“वही सीताराम, वही राधेश्याम, वही ब्रह्म।” योगी परमात्मा कहते हैं, ज्ञानी ब्रह्म, भक्त भगवान।
ज्ञान प्रधान। द्वंद्वातीत अवस्था। प्रेम का प्रकाश कम। भगवान की मधुर लीला में डूब नहीं पाता।
२. दास्य भाव
“ये मेरे स्वामी हैं।” अनन्यता बढ़ती है। तुलसीदास जी — “बने तो रघुवर ते बने, बिगड़े तो भरपूर।”
प्रेम का प्रकाश होने लगता है। ज्ञान है लेकिन प्रेम दबाता नहीं।
३. सख्य भाव
“भगवान मेरे मित्र।” भय खत्म। “तुम एक बोलोगे, हम दो बोलेंगे।” साथ खेलना, साथ हँसना।
दास्य से भी अधिक प्रेम। स्वामी की प्रतीक्षा नहीं — मनमानी की छूट।
४. वात्सल्य भाव
माँ-बाप का प्रेम। भगवान को स्नान कराना, दुलारना, खिलाना। यशोदा माँ का पूर्ण अपनत्व।
सख्य से अधिक सुख। पूर्ण ममत्व का भाव।
५. माधुर्य भाव (कांता)
गोपी भाव। सर्वोच्च। “जित देखो तित श्याममई।” प्रीतम के सिवा देखने की इच्छा ही नहीं।
ऐश्वर्य ज्ञान दब जाता है। प्रेम की पूर्ण अनन्यता। “रसना कटो जो अन रटो।”
“प्रेम में ऐश्वर्य ज्ञान दब जाता है। ऐश्वर्य ज्ञान में प्रेम दब जाता है। समता सब संसार में — लेकिन ममता अपने इष्ट में।”— प्रेमानंद जी महाराज
महाराज जी ने बताया — द्वैत से अद्वैत, और फिर प्रेम मार्ग में पुनः भावमय द्वैत। अद्वैत में स्थित होना मोक्ष है, लेकिन भक्त उससे भी आगे — प्रेम में — जाता है।
कर्म, प्रारब्ध और जीवन का सच – Acche Log Dukhi Kyu Hote Hain?

महामंडलेश्वर आत्मानंद गिरी जी ने पूछा — “प्रारब्ध और कर्म में भेद क्या है? अच्छे लोग दुखी और बुरे लोग सुखी क्यों दिखते हैं?”
संचित कर्म
अनेक जन्मों के एकत्रित सभी कर्मों का संग्रह। ब्रह्म साक्षात्कार तक नष्ट नहीं होते। इसी से पुनर्जन्म का चक्र चलता है।
प्रारब्ध कर्म
संचित में से जो शुभ-अशुभ कर्म निकालकर इस जन्म का शरीर बना। बड़े-बड़े सिद्धों को भी यह भोगना ही पड़ता है।
क्रियमाण कर्म
इस जन्म में अभी जो कर्म हो रहे हैं। इनका फल तुरंत नहीं मिलता। अकर्ता भाव से ये निष्प्रभावित होते हैं।
तो फिर अच्छे लोग दुखी और बुरे लोग सुखी क्यों?
जो आज पाप कर रहा है और सुखी दिख रहा है — वो पूर्व के पुण्य का भोग कर रहा है। जब वो पुण्य समाप्त होगा और वर्तमान के पाप का फल आएगा — तब नाश होगा। जो आज धर्मात्मा है पर दुखी दिखता है — वो पूर्व के पाप का भोग कर रहा है।
“वर्तमान का जो तुरंत फल देता है — वो है संत अपराध। साधु अवज्ञा तुरंत भवानी।”
— प्रेमानंद जी का ऑफिसियल वेबसाइट – Click kare
गुरु की शरण — Ahankar se Mukti ka Ek hi Raasta

राज बहादुर यादव जी ने पूछा — “महाराज जी, मैं अहंकार से कैसे बचूँ?”
महाराज जी का उत्तर सीधा था — “गुरु की शरण में जाओ। बिना गुरु की शरण में गए अहंकार नष्ट नहीं हो सकता।”
🙏 गुरु — सर्वोच्च वैद्य, सद्गुरु औषधि
महाराज जी ने कहा — “सद्गुरु वैद्य वचन विश्वासा, संयम यह न विषय के आशा।” गुरुदेव ही ऐसे सद्वैद्य हैं जो अहंकार रूपी फोड़े का ऑपरेशन कर सकते हैं। गुरु की आज्ञा, उपदेश, डाँट-फटकार — यही सब औषधि है।
कुम्हार का उदाहरण — जैसे कुम्हार मटकी को अंदर हाथ लगाकर ऊपर से ठोकता रहता है — अंदर सहारा, बाहर प्रहार — इसी से मटकी सुंदर बनती है। ऐसे ही गुरुदेव हमें ठोक-बजाकर अपने लायक बना लेते हैं।
गुरु ज्ञान दृष्टि प्रकट करते हैं — मलिन अहंकार नष्ट हो जाता है। सृष्टि में दूसरा कोई नहीं जो हमारे अहंकार को हटा सके।
गुरु की शरण के तीन स्तंभ:
- गुरुदेव का वरण करो
- उनकी आज्ञा का पालन करो
- शास्त्र और संतों का संग करो
चाहे ब्रह्म बोध की तरफ जाना हो या भगवत प्रेम की तरफ — दोनों में बाधक जो अभिमान है, उसका त्याग गुरुकृपा से ही होता है। यही Premanand Ji Maharaj Pravachan का सबसे महत्वपूर्ण सन्देश है।
मन को कैसे कण्ट्रोल करे — Naam Jap hi Ek Raasta Kyu ?

एक श्रद्धालु ने कातर होकर कहा — “महाराज जी, इस मन ने जीना हराम कर रखा है। हर समय गंदे विचार। मुझे बचा लो।”
महाराज जी ने कहा — “यह केवल तुम्हारा नहीं — पूरे विश्व का प्रश्न है।”
मन इतना बलवान क्यों है?
“इंद्रिय नाम मनस — इंद्रियों में मैं मन हूँ।”— भगवद्गीता (महाराज जी के शब्दों में)
मन बलवान इसलिए है क्योंकि उसे बल देने वाले स्वयं भगवान हैं। और इसीलिए उसे रोकने की शक्ति भी केवल भगवान के नाम में है।
मन का स्वभाव — पतन की ओर
महाराज जी ने सुंदर उदाहरण दिया — जल का स्वभाव है नीचे जाना। छोड़ दो — बह जाएगा। ऊपर चढ़ाना हो तो मशीन चाहिए। ठीक वैसे ही — मन का स्वभाव पतन की ओर है। बिना यंत्र के ऊर्ध्वगामी नहीं होगा।
वो यंत्र है — नाम जप।
नाम पाहू दिवस रात।
नाम के बिना मन को कोई नहीं रोक सकता।
महाराज जी बोले — “मन लगे चाहे न लगे — नाम जप करते रहो। नाम जपत मंगल दसहु।”
- नाम जप काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर से बचाता है।
- पुराने पाप नष्ट होते हैं, मन पवित्र होता जाता है।
- आगे गलती न हो — ऐसी सामर्थ्य भी मिलती है।
- मन ठीक, निर्मल और उर्ध्वगामी बनता है।
Premanand Ji Maharaj ke Anusar – नाम जप का असली महत्वा
“नाम जप में मन तभी लगेगा जब सत्संग करोगे। बिना भजन में मन लगे प्रेम नहीं होता। बिना प्रेम के भगवत साक्षात्कार नहीं होता।”— प्रेमानंद जी महाराज (मूल प्रवचन)
- सत्संग
- नाम जप / भजन
- प्रेम
- भगवत साक्षात्कार
महाराज जी ने कहा — “मूल में नाम है।” प्रेम का मूल, मुक्ति का मूल, मन को ठीक करने का मूल — सब कुछ नाम जप से शुरू होता है।
प्रेम मूल यह नाम है, प्रेमी रसिक जपत।
नाम जपत मंगल दसहु — चिंता मत करो।
— भक्त वाणी (महाराज जी उद्धृत)
Premanand Ji Maharaj Pravachan — जीवन में लागु करने योग्य सिख
- किसी की निंदा मत करो — निंदक के प्रति भी मंगल कामना रखो। यही अनन्यता है।
- कट्टरता छोड़ो, अनन्यता अपनाओ — धर्म में दृढ़ रहो पर दूसरों का सम्मान करो।
- गुरु की शरण लो — अहंकार का नाश बिना गुरुकृपा के असंभव है।
- रोज नाम जप करो — मन लगे या न लगे। नाम जपत मंगल दसहु।
- सत्संग करो — संतों की संगत के बिना भजन में मन नहीं लगता।
- प्रारब्ध पर भरोसा रखो — दुख में घबराओ मत, यह प्रारब्ध का भोग है।
- “मैं” को गुरु चरणों में समर्पित करो — यही भक्ति से प्रेम तक का मार्ग है।
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३. विश्वशांति का असली रास्ता क्या है? प्रेमानंद जी महाराज ने बताया
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Ananyata aur kattarta mein kya antar hai?
अनन्यता सरस है — इसमें दया, करुणा और क्षमा होती है। कट्टरता नीरस है — इसमें क्रोध, ईर्ष्या और दूसरे की हानि की भावना होती है। अनन्य भक्त निंदक पर भी मंगल कामना करता है।
Bhakti aur Prem mein kya fark hai?
भक्ति में ‘मैं’ की उपस्थिति होती है — “मैं भजन कर रहा हूँ।” प्रेम में ‘मैं’ का विस्मरण हो जाता है — केवल भगवान रह जाते हैं। प्रेम भक्ति की अंतिम और सर्वोच्च अवस्था है।
Ahankar se kaise bache?
गुरु की शरण में जाओ। गुरुदेव ही अहंकार रूपी फोड़े का ऑपरेशन कर सकते हैं। गुरुदेव का वरण करो, उनकी आज्ञा पालन करो और शास्त्र-संत संग करो।
Man ko kaise control kare?
नाम जप ही एकमात्र उपाय है। मन का स्वभाव पतन की ओर है — जैसे जल नीचे जाता है। नाम जप वो यंत्र है जो मन को ऊर्ध्वगामी बनाता है। मन लगे या न लगे — नाम जपते रहो।
Prarabdh aur Karm mein kya antar hai?
संचित कर्म — अनेक जन्मों का संग्रह। प्रारब्ध — इस जन्म का शरीर बनाने वाले कर्म जो भोगने ही पड़ते हैं। क्रियमाण — इस जन्म के वर्तमान कर्म जिनका फल भविष्य में मिलता है।
Naam Jap ka kya mahatva hai?
नाम जप प्रेम का मूल है। नाम जप से पाप नष्ट होते हैं, मन पवित्र होता है और काम-क्रोध से रक्षा होती है। बिना नाम जप के मन को काबू में नहीं किया जा सकता।
भक्ति से प्रेम तक — एक अमृत यात्रा
Premanand Ji Maharaj Pravachan में जो कहा गया — वो कोई उपदेश नहीं था। वो एक दर्पण था जिसमें हर साधक अपना चेहरा देख सकता था।
अनन्यता से शुरू करो — क्योंकि जब तक दूसरे की निंदा है, तब तक भगवान नहीं। अहंकार छोड़ो — क्योंकि “जब मैं था तब हरि नहीं।” गुरु की शरण लो — क्योंकि कुम्हार के बिना मटकी नहीं बनती।
नाम जपो — क्योंकि “नाम पाहू दिवस रात।” धीरे-धीरे भक्ति प्रेम में बदलेगी। वो ‘मैं’ जो बाधा बना था — एक दिन खो जाएगा।
और जब वो ‘मैं’ खो जाएगा — तब केवल वो रहेंगे।
केवल नंदलाल। केवल राधेश्याम।
“प्रेम मगन निज बन विश्राम।
श्री राधा वल्लभ लाल की जय।”
🙏 राधे राधे 🙏
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