प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं: दूसरों को खुश करने की कोशिश में जीवन नष्ट मत करो। केवल भगवान का भजन करो और धर्म में निष्ठा रखो – तब सब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा। यह अनुभव की बात है, न कि किसी किताब की।
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1. दूसरों को खुश करना – एक नकली सपना है
लाख कोशिश करो, पर कोई खुश नहीं होगा
आप अपने माता-पिता, पत्नी, बेटे, दोस्तों – किसी को भी खुश करने के लिए जो कुछ भी कर दो:
- पैसे दो – फिर और मांगेंगे
- समय दो – अभी भी नाराज रहेंगे
- प्राण दे दो – तब भी शिकायत बनी रहेगी
प्रेमानंद जी कहते हैं: “यह माया है।” यह खेल कभी खत्म नहीं होता।
बस एक चीज जो काम करती है – भगवान
लेकिन जो व्यक्ति भगवान को खुश करने लगता है, भगवान का भजन करता है:
- वह निर्भय हो जाता है।
- सब लोग अपने आप उसके साथ देने के लिए राजी हो जाते हैं।
- उसका मन शांत रहता है।
याद रखो: “अगर राजी होने की बात है, तो एकमात्र जो प्रभु का ईमानदार भजन करते हैं, वही सच में राजी हो सकते हैं।”
2. इंद्रियों का मोह – तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन
इंद्रियां क्या करती हैं?
इंद्रियां (आँखें, कान, जीभ, नाक, त्वचा) तुम्हें:
- खुशी का झूठा सपना दिखाती हैं।
- मन को मलिन करती हैं।
- पाप के काम ज्यादा करवाती हैं।

मरुस्थल में जल का मायावी सपना
प्रेमानंद जी एक उदाहरण देते हैं।
सूर्य की तेज किरणों में मरुस्थल में ऐसा लगता है कि सामने स्वच्छ जल भरा है। लेकिन जब तुम पास जाते हो, तो केवल रेत मिलती है।
हिरन को भी यही भ्रम होता है। वह दौड़ता-दौड़ता प्यास ही प्यास में मर जाता है। उसकी प्यास कभी नहीं बुझती।
ठीक ऐसे ही:
- इंद्रियां मिथ्या सुख दिखाती हैं।
- मन उन्हें भोगने के लिए दौड़ता है।
- पर असली शांति कभी नहीं मिलती।
इंद्रियों से कैसे मुक्त हो?
तीन तरीके:
| विधि | क्या करें |
|---|---|
| हठपूर्वक | जबरदस्ती इंद्रियों का मोह तोड़ दो |
| विवेक से | समझ लो कि यह सुख झूठा है। |
| भक्ति से | प्रभु को समर्पित कर दो। |
प्रेमानंद जी कहते हैं: “जैसे बने, वैसे उन गंदी चेष्टाओं से बचो।”
3. मन और शोक – एक सीधा रिश्ता
पाप कर्म = भय + चिंता + शोक
जब तुम गलत काम करते हो।
- मन मलिन हो जाता है।
- फिर चिंता आती है।
- फिर शोक आता है।
- अंत में डिप्रेशन में पहुंच जाते हो।
प्रेमानंद जी: “ध्यान रखना – बिना पाप कर्म किए डिप्रेशन नहीं होता। यह अपराध का दंड है।”

कहानी: राज्य छोड़ कर अकेले थे
एक कलाकार था। उसने अधर्मपूर्ण काम किए। फिर उसे धीरे-धीरे पीड़ा मिलना शुरू हुवा।
- रात की नींद गई
- मन की शांति गई
- पूरे जीवन भय में रहा
क्योंकि उसने अपने भीतर गलत काम किया था।
4. “ममता” और “प्रेम” – दो अलग चीजें हैं
ममता क्या है?
ममता = देह का भाव (शरीर से जुड़ाव)
- “यह मेरी पत्नी है”
- “यह मेरा बेटा है”
- “यह मेरी संपत्ति है”
यह नष्ट करने वाली है।

प्रेम क्या है?
प्रेम = भगवत भाव (भगवान को देखना हर जीव में)
- सब में परमात्मा को मानो
- बिना शरीर के भाव से प्रेम करो
- यह मुक्ति देने वाला है।
व्यावहारिक उदाहरण
एक विद्युत है जो सब यंत्रों में जाती है:
- बल्ब में गई = प्रकाश
- पंखे में गई = हवा
- हीटर में गई = गर्मी
- फ्रिज में गई = ठंडक
यंत्र के आकार से प्रभाव अलग है, पर विद्युत एक ही है।
ठीक ऐसे ही:
- कोई पापी है, कोई संत है
- पर परमात्मा सब में समान है।
इसी को समझकर प्रेम करो, न कि ममता से।
- Premanand Ji ने बताया भगवत प्रेम का पथ – 7 दृढ़ निश्चय जो जीवन बदल देते हैं | CLICK HERE
5. नाम-जप और भजन – सच्चा रास्ता
क्यों नाम-जप जरूरी है?
प्रेमानंद जी कहते हैं: “जिसका भजन छूट गया, वह जीवित ही नहीं है।”
नाम-जप से:
- मन शुद्ध होता है।
- आध्यात्मिक रस मिलता है।
- असली आनंद आता है।

चतुरासी जी के पद – सोना है
एक पद को बार-बार गाने से:
- मन को शांति मिलती है।
- भगवान से सीधा जुड़ाव होता है।
- 108 बार मंत्र जपने जैसा लाभ होता है।
सलाह: एक पद चुनो और रोज कम से कम 10-20 बार गुनगुनाओ।
6. “कच्चे” और “पक्के” भक्त – अंतर समझो
कच्चा भक्त (अभी सीख रहा है)
कच्चा भक्त:
- सब कुछ तर्क से सीखता है।
- सवाल ज्यादा पूछता है।
- ज्ञान की बातें करता है।
- लेकिन अनुभव नहीं होता।
नुकसान: जब गुरु कुछ गहरी बात कहने लगता है, तो कच्चा भक्त बीच में तर्क करने लगता है। फिर गुरु की अमृत वाणी रुक जाती है।

पक्का भक्त (पका हुआ)
पक्का भक्त:
- चुप रहता है और सुनता है।
- हृदय से विश्वास करता है।
- अनुभव से जानता है।
- समर्पित रहता है।
फायदा: पक्के भक्त को गुरु की पूरी कृपा मिलती है।
7. भंडारा और दक्षिणा – सही तरीका क्या है?
प्रसाद कैसा होना चाहिए?
संतों का भंडारा (प्रसाद) तब अच्छा है, जब:
| गलत तरीका | सही तरीका |
|---|---|
| लाभ या फायदे के लिए | प्रेम और भक्ति से |
| बड़ी दक्षिणा लेना | उदर पोषण ही काफी |
| दिखावा करना | ईमानदारी से सेवा करना |
| अपने नाम के लिए | प्रभु के नाम से |

एक सच्ची कहानी
विट्ठल दास जी एक राज्यपाल थे। उन्हें श्रीहरि का प्रेम था, न कि राज का।
जब गुरु ने कहा: “भोग बड़ा है या प्रेम?”
तो विट्ठल दास जी ने कहा: “बड़ी रोटी हो या छोटी, प्रेम से बनी हो तो वही असली प्रसाद है।”
- प्रेमानंद जी ने बताया: निवृत्ति और प्रवृत्ति मार्ग से मोक्ष संभव है – भगवत प्राप्ति का मूल दर्शन CLICK HERE
8. जाति-पांति को भुला दो – भक्ति में सब बराबर
प्रेमानंद जी की बात
प्रेमानंद जी कहते हैं: “अगर किसी में भगवान का नाम है, भक्ति है, तो उसकी जाति क्या मायने रखती है?”
उदाहरण – कालिदास जी
कालिदास जी एक नीच जाति के थे (भारतीय समाज के हिसाब से)। पर महापुरुष कृष्ण कहते थे।
“भक्त के चरण का अमृत पीना हो, तो कालिदास जी से सीखो।”
प्रेम में कोई भेद नहीं
जब तुम किसी को प्रेम से प्रसाद दो:
- गरीब हो या अमीर
- किसी भी जाति का हो
- अंदर का प्रेम ही देखा जाता है।
9. गुरु की कृपा – सबसे बड़ी दौलत
10 साल गुरु के साथ
प्रेमानंद जी खुद कहते हैं: मैंने 10 साल अपने गुरु के पास गहराई से देखा कि:
- एक पल भी गुरु का मन भगवान से हट नहीं जाता
- भले ही खा रहे हों, पानी पी रहे हों, पर दिमाग भगवान में ही है।
- हर चेष्टा में, हर हरकत में – भगवान का स्मरण है।
गुरु का सबक
गुरु के पास रहकर, गुरु की नकल करके (अच्छे तरीके से नकल करके):
- आध्यात्मिक रस आता है
- भगवान का सीधा अनुभव होता है
- जीवन बदल जाता है।
- पत्नी-पति का प्रेम कैसा होना चाहिए? श्री प्रेमानंद जी महाराज का सरल प्रवचन CLICK KARE
10. आखिरी सलाह – अभी शुरु करो
तुम्हारा जीवन
अगर तुम मानव योनि में हो:
- यह सबसे दुर्लभ चीज है
- इसमें पाप को नष्ट करने की शक्ति है।
- भगवान से मिलने का मौका है।
अभी करो, कल नहीं
तीन चीजें ध्यान में रखो:
- दूसरों को खुश करने की चिंता छोड़ो – अपने भजन पर ध्यान दो।
- इंद्रियों का मोह तोड़ो – धीरे-धीरे, पर दृढ़ता से।
- नाम-जप शुरु करो – कम से कम 15-20 मिनट रोज।
सीधा सवाल
प्रेमानंद जी पूछते हैं: “अगर भजन नहीं होता, तो होता क्या है?”
सोचो। जवाब खुद मिल जाएगा।
निष्कर्ष – याद रखो ये तीन बातें
- भगवान का भजन करो – दूसरों को खुश करने की नहीं, भगवान को खुश करने की कोशिश करो।
- इंद्रियों से दूर रहो – जो सुख दिख रहे हैं, वो झूठे हैं (मरुस्थल में पानी की तरह)।
- ईमानदारी से प्रेम करो – ममता नहीं, प्रभु-भाव से सबको देखो।
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प्रेमानंद जी का आखिरी संदेश:
“हे प्यारे, हे मित्र! वृंदावन आ जाओ। यहां रसिकों का संग मिलेगा। नाम-जप करो, भगवान का भजन करो। यह मनुष्य जन्म बहुत दुर्लभ है। इसे भगवान के लिए सार्थक कर दो।”
तुम्हारे लिए सवाल: क्या तुम भगवान के भजन में लगोगे, या दूसरों को खुश करने में समय गंवाते रहोगे?
जवाब अपने हृदय में खोजो। 🙏




