Premanand Ji ने बताया भगवत प्रेम का पथ – 7 दृढ़ निश्चय जो जीवन बदल देते हैं |

दुनिया की सारी दौलत, स्वर्ग और मोक्ष भी उसके आगे सिर्फ “एक रुपया” हैं? जानिए Premanand Ji की आँखें खोल देने वाली बात जो आपका जीवन दृष्टिकोण ही बदल सकती है।
Premanand Ji महान आध्यात्मिक गुरु जो भगवत प्रेम के पथ की शिक्षा देते हैं

श्री भगवन स्वरुप प्रेमानंद जी महाराज (Premanand Ji) कहते है की जीवन का सबसे बड़ा सवाल यह है की – हम आखिरकार चाहते क्या हैं? क्या धन, सत्ता, नाम, शान, आरोग्य? या फिर कुछ और ही जो इन सबसे परे है? महान आध्यात्मिक गुरु Premanand Ji ने अपने प्रसिद्ध सत्संग में यही प्रश्न उठाया है और समझाया है कि असली सुख क्या है। उन्होंने बताया कि भगवत प्रेम (Divine Love) ही एकमात्र लक्ष्य है जो इस जीवन को सार्थक बनाता है।

लेकिन इस प्रेम तक पहुंचना आसान नहीं है – इसके लिए बेहद सहनशीलता, पूर्ण त्याग और एकाग्र मन चाहिए। आइए समझते हैं कि यह आध्यात्मिक यात्रा आखिरकार कैसी होती है और हम कैसे इसमें सफल हो सकते हैं।


1. भगवत प्रेम – अरबो रुपये की संपत्ति और सिर्फ एक रुपया

प्रेम का महत्व और मूल्य

Premanand Ji ने एक शक्तिशाली उदाहरण दिया है:

“अगर किसी को एक अरब रुपया चाहिए और आप उसे एक रुपया दे दो, तो उसे कैसा लगेगा?”

जवाब आपको पता है – आप भी होंगे तो बहुत बुरा लगेगा! क्युकी उसके लिए वह एक रुपया कुछ भी नहीं है। ठीक उसी तरह, जो साधक भगवत प्रेम की तलाश में है, उसे बाकी सब कुछ तुच्छ लगता है।

मतलब क्या है? जो व्यक्ति एक बार भगवान के प्रेम का स्वाद चख लेता है, उसे:

  • स्वर्ग भी तुच्छ लगता है|
  • मोक्ष भी महत्वहीन लगता है|
  • योग की सिद्धियां (शक्तियां) भी बेकार लगती हैं|
  • सम्राट का पद भी साधारण लगता है|
  • इंद्र का पद (देवताओं का राजा) भी छोटा लगता है|

दिव्य प्रेम की प्राप्ति

जो उपासक अपना लक्ष्य केवल भगवत प्रेम रखते हैं, तो Premanand Ji के अनुसार केवल उनका मन प्रेम में होना चाहिए न ही वासना में,

“मुझे ये नहीं चाहिए। मेरा लक्ष्य तो प्रेम है, कुछ और नहीं।”

यही सच्चा भक्त है। उसे किसी और चीज की चाहत नहीं रहती।


शरीर के सुख और आत्मा का परम सुख - तुलना और अंतर
शरीर के अल्प सुख बनाम भगवान का परम प्रेम

2. छोटे सुख का त्याग – परम सुख की कुंजी

अल्प सुख से दूरी

Premanand Ji कहते हैं: “जो अल्प सुख में रमण करता है, वह परम सुख को खो देता है।”

यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण नियम है। आइए इसे समझते हैं:

अल्प सुख क्या हैं?

  • शरीर की सुविधाएं (खाना, कपड़े, आराम)
  • मन का मनोरंजन (नाटक, चलचित्र, गाने)
  • इंद्रियों का सुख (भोग)
  • नाम और शोहरत
  • रिश्तेदारों और दोस्तों का साथ

ये सब तो बंधन हैं! अगर आप इनमें फंस गए, तो परम सुख (भगवत प्रेम) से दूर हो जाएंगे।

तो सच्चा साधक कौन है?

एक सच्चा साधक वह है जो,

  • अल्प सुख का त्याग कर देता है|
  • भोग से विमुख हो जाता है|
  • नाम और शोहरत से दूर रहता है|
  • केवल भगवान की खोज में लगा रहता है|

Premanand Ji कहते हैं:

“जो अल्प सुख का त्यागी होता है, वही परम सुख (भगवत प्रेम) का अधिकारी बनता है।”


3. सहनशीलता (Patience) – भगवत प्रेम की नींव है |

सहनशीलता क्यों जरूरी है?

भगवत प्रेम की यात्रा में सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है – बेहद सहनशीलता

Premanand Ji कहते हैं:

“बहुत सहनशीलता चाहिए। बड़ी वस्तु प्राप्ति के लिए छोटी वस्तु में कहीं राजी न हो जाए।”

इसका अर्थ:

  • जब कोई छोटी-मोटी खुशी मिले, तो उसमें न फंस जाओ
  • जब कोई अस्थायी सुख आए, तो उसे पकड़ न लो
  • दृढ़ रहो! अपने बड़े लक्ष्य को न भूलो
सहनशीलता और दृढ़ निश्चय - भगवत प्रेम की नींव
दृढ़ निश्चय और सहनशीलता – प्रेम की यात्रा की कुंजी

दृढ़ निश्चय (Firm Determination)

Premanand Ji कहते हैं कि भगवत प्रेम के मार्ग में दृढ़ निश्चय होना चाहिए:

“सुख देखकर फिसलना नहीं है। ये लो, वो लो। इसकी आवश्यकता नहीं ! लक्ष्य सिर्फ एक और वह प्रेम है।”

यही मंत्र है! भले ही दुनिया क्या कहे, भले ही कितने भी लोभन आएं – आपका लक्ष्य प्रेम ही रहना चाहिए।


4. गलत संगति से बचें – सोच-समझ कर चुनें साथी

किन लोगों से दूरी रखनी चाहिए?

Premanand Ji ने स्पष्ट कहा है कि प्रेम मार्ग के साधक को कुछ लोगों से बिल्कुल दूर रहना चाहिए|

किससे आपको दूर रहने की जरुरत है |

  1. अहंकारी राजा और अधिकारी – जो अपने पद के गर्व में हैं|
  2. भोग-विलासी लोग – जो संसार के सुख में लिप्त हैं|
  3. पद और प्रतिष्ठा में फंसे लोग – जिन्हें नाम-शान की चाहत है|
  4. भगवान से विमुख लोग – जो प्रभु की खोज नहीं करते|
भगवत प्रेम की यात्रा में सहनशीलता और दृढ़ निश्चय का विशेष महत्व है। सहनशीलता का मतलब है कि जब छोटी खुशी मिले तो उसमें न फंसना, और दृढ़ निश्चय का अर्थ है कि किसी भी लोभन में न आना। यह चित्र इन दोनों गुणों के संतुलन को दर्शाता है।
सच्चे संत का साथ vs अहंकारी लोग – चुनें सही संगति

Premanand Ji का नियम है: “अभिमान से न्यारे भूत, भविष्य, लोक में भय होय। हरि प्यारे, तिन तिन सो व्यवहार।”

मतलब- जो लोग अभिमान से दूर रहते हैं, जिन्हें भूत, भविष्य या संसार (लोक) का भय नहीं होता, हरि (भगवान) उनसे प्रेम करते हैं और उन्हीं के साथ उनका व्यवहार होता है|

किन महापुरुषों का साथ लें?

प्रेम मार्ग के साधक को ऐसे महापुरुषों का साथ लेना चाहिए:

  • जो पद और प्रतिष्ठा से परे हों|
  • जो भगवान से ही प्रेम करते हों|
  • जो प्रभु की भजन में नियुक्त हों|
  • जो निःस्वार्थ भाव से सेवा करते हों|

“ऐसे महा भागवत ब्यक्ति का हृदय से स्वागत करना चाहिए।”


5. स्वर्ग, बैकुंठ और मोक्ष – ये सब क्या हैं?

पृथ्वी के लोगो के लिए स्वर्ग है क्या ?

Premanand Ji कहते हैं कि स्वर्ग केवल एक अच्छा सपना है – जैसे कोई रात में सपना देखे कि बहुत सुंदर घर है, खूबसूरत नारियां हैं, भोग है। लेकिन सुबह आंख खुली तो सब कुछ गायब!

“स्वर्ग भी ऐसा ही है – एक अच्छा, सुखद सपना। जब पुण्य खत्म हुए, तो फिर से मृत्यु लोक आ गया।”

देवताओं से क्या प्रयोजन?

Premanand Ji कहते हैं:

“देवताओं से मुझे क्या प्रयोजन है? क्या वो भगवान की प्राप्ति करा सकते हैं? क्या वो भगवत प्रेम दे सकते हैं? नहीं!”

महत्वपूर्ण बातें:

  • जो देवताओं को पूजते हैं, वो देवताओं को ही प्राप्त होते हैं|
  • जो भगवान को पूजते हैं, वो भगवान को ही प्राप्त होते हैं|
  • स्वर्ग अनंत नहीं है – वह स्वप्निक, अस्थायी है|
बैकुंठ भी अस्वीकार

Premanand Ji का एक खूबसूरत उदाहरण है: नंद बाबा के सखाओं की कथा

जब सखाओं को पता चला कि कृष्ण तो सच में भगवान हैं, तो उन्होंने कहा:

“अगर तुम भगवान हो, तो बैकुंठ दिखा दो।”

कृष्ण ने सखाओं को बैकुंठ दिखाया – वहां इंद्रनील का सिंहासन, भगवान का दिव्य रूप, लक्ष्मी जी का साथ। लेकिन सखाओं को वह सब नापसंद आ गया!

“नहीं! हमारा तो कन्हैया ही चाहिए। ऐसे बैकुंठ में नहीं जाना, जहां से तुम इतनी दूर हो।”

यही है असली प्रेम! भगवान का वैभव नहीं, भगवान का साथ चाहिए।


6. दुख – भगवत प्रेम का सेतु

भगवान क्यों दुख देते हैं?

यह सवाल सभी के मन में आता है। Premanand Ji का जवाब अद्भुत है|

“जिस पर मैं परम कृपा करता हूं, उसका सर्वनाश कर देता हूं। धन का अपहरण कर लेता हूं। स्वजनों को छीन लेता हूं। तब उसका सीधा भाव मेरी ओर होता है।”

दुख का वैज्ञानिक कारण

Premanand Ji एक शानदार उदाहरण देते हैं – क्या आपने कभी कोयला से चलने वाली रेल के इंजन को देखा है|

जब कोयले को भट्टी में झोंका जाता है, तो भाप बनती है। यही भाप इंजन को शक्ति देती है और तभी रेल चलती है| ठीक वैसे ही,

“जब साधक के जीवन में भारी दुख की स्थिति आती है, तो उसकी अध्यात्मिक शक्ति जागृत होती है। हर भरोसा टूट जाता है। केवल एक ही भरोसा – भगवान का। तब वह पावर से परमात्मा की ओर जाता है।”

कुंती जी की प्रार्थना

महाभारत में कुंती जी (कृष्ण की मौसी) की प्रार्थना बहुत प्रसिद्ध है:

“हे भगवान! मुझे पग-पग पर दुख चाहिए, क्योंकि दुख में ही तुम्हारे सानिध्य का अनुभव होता है।”

यही है सच्ची समझ! दुख तो तरबूज को मीठा बनाने के लिए जरूरी है।


7. साधना और कृपा – दोनों एक साथ

साधना करनी चाहिए या नहीं?

Premanand Ji कहते हैं कि यहां एक गहरी बात है छुपी हुई है |

साधना हो रहा है, पर मुझे भरोसा लाडली की कृपा पर है। अपने साधना का नहीं।”

दोनों चीजें करनी चाहिए:

  1. पूरी लगन से साधना करो – परिक्रमा, भजन, ध्यान, सेवा
  2. लेकिन भरोसा भगवान पर रखो – ये मानना कि “ये सब कृपा से हो रहा है|

अहंकार न आ सके

जो साधक अहंकार से कहते हैं: “आज मैंने परिक्रमा की। आज मैंने ये किया। आज मैंने वो किया” – ये गलत है।

“जब तक अहंकार है, भगवत प्राप्ति नहीं होती है।”

Premanand Ji कहते हैं:

“मन, क्रम, वचन सब कुछ शुद्ध करो। लेकिन भरोसा रखो: ये सब भगवान की कृपा से हो रहा है, मेरे प्रयास से नहीं।”


8. सच्चे प्रेमियों की दुर्लभता

प्रेमी कितने दुर्लभ हैं?

Premanand Ji बहुत स्पष्ट कहते हैं: “संसार में सच्चे प्रेमी एक-दो ही होते हैं, उंगलियों से गिने जाते हैं।”

ऐसा क्यों? क्योंकि सच्चा प्रेमी वह है:

  • जिसे राजाओं से कोई प्रयोजन नहीं
  • जिसे देवताओं से कोई लेना-देना नहीं
  • उन्हें स्वर्ग चाहिए नहीं
  • न ही मोक्ष न ही बैकुंठ चाहिए|
  • जो केवल प्रिया-प्रीतम के लिए तड़पता है|

वल्लभाचार्य का उदाहरण

एक बार वल्लभाचार्य के शिष्य ने कहा: “गुरु जी! हम 100 विद्वान ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहते हैं।

वल्लभाचार्य ने कहा: “अगर एक प्रेमी भक्त को भोजन करा दो, तो 100 ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल मिल जाएगा।”

शिष्य ने कहा: “तब तो हम 100 प्रेमी भक्तों को भोजन कराएंगे।”

यह सुनकर वल्लभाचार्य के आंसू बह गए। क्यों? क्योंकि उन्होंने कहा: “प्रेमी तो एक-दो ही होते हैं। 100 प्रेमी कहां से लाओगे?”


9. शरीर की दुर्दशा – सच्चाई को समझो

शरीर की सुरक्षा करोगे तो शरीर नष्ट हो जाएगा

Premanand Ji कहते हैं कि जो साधक शरीर को ज्यादा महत्व देते हैं, वह गलती करते हैं|

“इस शरीर को सजाने से श्रीकृष्ण नहीं मिलते हैं भैया। ऐसे-ऐसे साधक सोचते हैं – अगर बाल मुंडवा दूं, शरीर को कष्ट दूं, तो प्रभु मिलेंगे। पर यह गलत है।”

वास्तविकता यह है:

  • जितना ज्यादा शरीर की देखभाल करोगे, शरीर उतनी ही दुर्दशा का शिकार होगा
  • अहंकार (अहम्) भी शरीर का साथ नहीं देता
  • रुपया, भोग, शरीर – ये सब बाधक हैं भगवत प्राप्ति में

यमुना की मिट्टी का उदाहरण

Premanand Ji कहते हैं कि कुछ साधक ऐसे हैं जो यमुना की मिट्टी अपनी मस्तक पर लगाते हैं। क्यों? क्योंकि कृष्ण वहां खेलते थे। दर्शन मात्र से ही व्यक्ति निष्पाप हो जाता है।

“ऐसे दर्शन से जो रज लगी है, जिसके लिए शिव, सनक आदि तरसते हैं।”


10. प्रेम मार्ग के लिए आवश्यक गुण

आवश्यक गुणविवरण
सहनशीलताबड़ी चीज के लिए छोटी चीज का त्याग करना
दृढ़ निश्चयलक्ष्य से हिलना-डुलना न हो
वैराग्यसंसार के सुख से दूर रहना
गुरु-भक्तिसच्चे गुरु पर आस्था रखना
सत्संगसच्चे भक्तों का साथ लेना
विश्वासभगवान पर पूर्ण भरोसा रखना
समर्पणअपने आपको पूरी तरह भगवान को समर्पित करना
धैर्यफल की चिंता न करके साधना करना

11. सत्य बोलने की योग्यता खोना

आज की समस्या

आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोगों ने सत्य सुनने की योग्यता खो दी है|

“अंदर मनमानी आचरण है, तो कौन सुनेगा? शास्त्र रखे-के-रखे रह जाते हैं।”

समस्या का कारण,

  • सुनाने वाला – सुनने वाले का मनोरंजन चाहता है|
  • सुनने वाला – अपने मन का मनोरंजन चाहता है|
  • दोनों के तार मिल गए, तो तालियां बजती हैं|

लेकिन भगवान की प्राप्ति के मार्ग में,

  • न तालियां बजती हैं|
  • न मन को बजाया जा सकता है|
  • मन को भंजन (नष्ट) करना पड़ता है|

12. कृपा ही सब कुछ है

भगवान की कृपा का महत्व

Premanand Ji अंत में कहते हैं:

“जब द्रव, दीन, दयालु राघव। साधु संगति प, दुख-सुख अविद। अपयशो जानी। कीर्ति पराम ध्यान से।”

यानी: जब भगवान की कृपा हो जाती है, तो दुख भी सुख बन जाता है।

आखिरी संदेश

Premanand Ji कहते हैं:

“हिम्मत हो तो कूदो अखाड़े पर! नारायण अति कठिन है। हरि मिलन की बात में पग पीछे धर के, प्रथम शीश दे काट! तो आप कहोगे – फिर भक्ति करना ही नहीं? नहीं! यह चरम सीमा की बात है।”

जो परमहंस हैं, जो सच्चे भक्त हैं – वो:

  • दिखावे में विश्वास नहीं रखते
  • शरीर की सुंदरता से नहीं, गुण से आकर्षित होते हैं
  • शुद्ध ज्ञान की खोज करते हैं
  • सच्चिदानंद परमात्मा को अपना लक्ष्य मानते हैं

निष्कर्ष

Premanand Ji का पूरा प्रवचन एक ही बात को कहता है: भगवत प्रेम ही जीवन का परम लक्ष्य है। इसके लिए इन चीजो को होना जरुरी है |

✅ अथाह सहनशीलता – ताकि बड़े लक्ष्य के लिए छोटे सुख का त्याग कर सकें|

✅ दृढ़ निश्चय – ताकि किसी भी लोभन में न फंस जाएं|

✅ सच्चे संत का सानिध्य – ताकि सही रास्ता मिले|

✅ भगवान पर अटूट विश्वास – ताकि साधना फलदायी हो|

✅ संसार के सुख का त्याग – ताकि परम सुख तक पहुंच सकें|

✅ दुख को गले लगाना – क्योंकि दुख में ही भगवान का सानिध्य मिलता है|

✅ अहंकार का नाश – क्योंकि अहंकार ही एकमात्र बाधा है|

यह मार्ग कठिन है, दुर्लभ है, लेकिन असंभव नहीं। जो एक बार इसे अपनाता है, वह सच्चे प्रेमी बन जाता है। और सच्चे प्रेमी के लिए भगवान का प्रेम ही सब कुछ है – न स्वर्ग, न मोक्ष, न बैकुंठ, केवल प्रिया-प्रीतम का साथ!


मुख्य Takeaways (याद रखने योग्य बातें)

  1. भगवत प्रेम सर्वश्रेष्ठ है – स्वर्ग, मोक्ष सब कुछ इससे कम है
  2. अल्प सुख का त्याग करो – तभी परम सुख मिलेगा
  3. दृढ़ रहो अपने लक्ष्य में – भले ही कितने भी लोभन आएं
  4. गलत संगति से दूर रहो – अहंकारी लोगों से बचो
  5. दुख को स्वीकार करो – क्योंकि दुख ही प्रेम की परीक्षा है
  6. भगवान पर विश्वास रखो – साधना करो पर अहंकार न करो
  7. सच्चे भक्तों का साथ लो – जो केवल प्रेम चाहते हैं
  8. संसार को समझो – ये सब स्वप्न है, अस्थायी है
  9. अपने आपको समर्पित करो – पूरी तरह भगवान को
  10. धैर्य रखो – प्रेम की प्राप्ति में समय लगता है

यह भी पढ़े – प्रेमानंद जी ने बताया: निवृत्ति और प्रवृत्ति मार्ग से मोक्ष संभव है – भगवत प्राप्ति का मूल दर्शन

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